भारत में अब डेंगू का कहर। बिजनौर ज़िले में हुई डेंगू से कई मौत। | सोहबत न्यूज

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भारत में अब डेंगू का कहर। बिजनौर ज़िले में हुई डेंगू से कई मौत। | सोहबत न्यूज


आज सुबह जिले की बिलग्राम सीएचसी में तैनात डॉक्टर सबा फारूखी की मौत की खबर आ गयी । डॉक्टर सबा डेंगू से पीड़ित थीं और इनका लखनऊ के एक प्राइवेट अस्पताल में इलाज चल रहा था । डॉक्टर सबा ने लंबे अरसे तक लख़नऊ के कोविड हॉस्पिटल बीकेटी में बतौर डॉक्टर ड्यूटी की थी , कोविड पॉजिटिव भी हुई पर लड़ी और जीती , कोविड से जीत गयीं डॉक्टर सबा पर डेंगू से हार गयी । 

सोचिये एक एमबीबीएस सरकारी डॉक्टर , कोविड से लड़ाई की अनुभवी , हर तरह की जानकारी रखने वाली डेंगू जैसे गैरजानलेवा बुखार का शिकार हो गयी , हालाकिं उनके परिचित लोग बताते हैं कि डॉक्टर सबा ने अपना इलाज समय से शुरू कर दिया था पर उनके प्लेटलेट्स इतनी तेजी से गिरना शुरू हुए कि हरदोई से लख़नऊ तक की दूरी तय करना उनकी और उनके स्वजनों की जान बचाने के लिए की गई सारी कोशिशों पर भारी पड़ गयी । अगर जिले में ही प्लेटलेट्स की कमी पूरी कर देने की समुचित व्यवस्था होती तो सम्भव था कि डॉक्टर सबा जैसी काबिल और नेक दिल डॉक्टर आज हमारे बीच ही होतीं ।



वैसे सरकारी आंकड़ों की माने तो जिला हरदोई में डेंगू के इस वक्त 81 मरीज हैं , दवा इलाज की कोई कमी नही है । रोजाना छिड़काव , स्प्रे आदि किया जा रहा है , कहाँ किया जा रहा है ईश्वर ही जाने , अगर वाकई में इतनी दिलचस्पी से आम और खास दोनो जगहों पर समान रूप से किया जा रहा है तो डेंगू का लार्वा क्या अमृत छक कर आया है जो खत्म या कमजोर नही हो रहा। आम हकीकत क्या है.

 आम जन भी समझ जान सकते हैं । कमोबेश हर एक दिन दो चार लोगों की डेंगू से मौत की दुःखद खबरे आ रही हैं , हर एक सामाजिक व्यक्ति के चार छह परिचित डेंगू से पीड़ित हैं , जिले में इलाज की कितनी व्यवस्थाएं इसका अंदाजा इस बात से ही लगा सकते हैं कि सिवाय पैरासिटामोल या मच्छरदानी के जिला अस्पताल में कुछ नही.

अधिकांश मरीज लखनऊ या बरेली में इलाज करवा रहे हैं जो सक्षम हैं वो भी , जो सक्षम नही हैं वो भी किसी तरह । जानकार कहते हैं कि डेंगू से ग्रस्त होने पर तुरन्त ही इलाज शुरू कर देना चाहिए , डेंगू जानलेवा तब बनता है जब प्लेटलेट्स गिरना शुरू ही रहे , ऐसे में साधारण इलाज नाकाफी हो जाता है , प्लेटलेट्स की कमी को पूरा करने के लिए जितनी जल्दी प्लेटलेट्स चढ़ाने की प्रक्रिया शुरू की जाए उतना ही अच्छा रहता है मरीज के लिए ।


 हरदोई में प्लेटलेट्स अरेंज करने की फिलहाल कोई व्यवस्था है नही , व्यवस्था करने के लिए जब तक इंसान लखनऊ बरेली दौड़ता है तब तक हो जाती है देर और खेल खत्म ।



महीने पहले हरदोई के जिला अस्पताल जो कि अब मेडिकल कॉलेज का एक हिस्सा भी है, में ब्लड कम्पोनेंटर मशीन आ गयी थी जिससे कि ब्लड से प्लाज्मा को अलग किया जा सकता था । मशीन के आने से ये उम्मीद जगी थी कि अब कम से कम डेंगू का इलाज पूरी तरीके से जिले में होना शुरू हो जाएगा , डेंगू वार्ड केवल मच्छरदानी वाला नही रह जायेगा । कम से कम प्लेटलेटस की कमी होने पर लखनऊ बरेली की दूरी तय करने का समय बच जाएगा , उतनी देर में जान बचाने लायक प्रयास जिले में कर लिए जाएंगे । 

उम्मीदें थी ये पर मशीन अरसे बाद तक शुरू नही हो पाई , पीएम नरेंद्र मोदी ने मेडिकल कॉलेज की शुरुआत भी कर दी पर ये मशीन नही शुरू हो पाई । आज की ताजा जानकारी के मुताबिक अभी विभागीय प्रक्रियाओं के दौर से ही गुज़र रहा है मशीन का इंस्टालेशन का काम , कागजी प्रक्रिया पूरी होने के बाद एक महीने की ट्रेनिंग दी जाएगी.

 एलटी को तब मशीन शुरू होगी । तब तक डेंगू वार्ड हरदोई का मच्छरदानी भरोसे चलेगा और प्राइवेट नर्सिंगहोम वाले अपने हाँथ में स्थिति न रहने की सूरत में मरीज को लखनऊ या बरेली जैसी जगहों पर रेफर करने पर मजबूर होते रहेंगे ।



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